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भस्त्रिका प्राणायाम बहुत ही महत्वपूर्ण प्राणायाम है। इस प्राणायाम द्वारा शरीर को प्राण-वायु अधिक मात्रा में उपलब्ध करायी जाती है तथा उसी प्रकार अधिक दूषित वायु (कार्बन डाइऑक्साइड) बाहर निकाली जाती है। इससे तेजी से रक्त की शुद्धि होती है तथा शरीर के विभिन्न अंगों में रक्त का संचार तेज होता है। यह प्राणायाम कुंडलिनी शक्ति को जगाने में बहुत सहायक है। दुर्बल हृदय व रक्तचाप वाले रोगियों को यह प्राणायाम नहीं करना चाहिए ।

भस्त्रिका का मतलब है धौंकनी। लोहार की धौंकनी के समान कुछ बलपूर्वक श्वासप्रश्वास क्रिया को जल्दी-जल्दी करना ही भस्त्रिका प्राणायाम है। भस्त्रिका प्राणायाम में इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना तीनों नाड़ियां प्रभावित होती हैं।

भस्त्रिका प्राणायाम कैसे करें | Bhastrika Pranayama Kaise Kare

भस्त्रिका प्राणायाम करने की विधि - Bhastrika Pranayama Karne Ki Vidhi


पद्मासन या सिद्धासन में बैठकर गर्दन व रीढ़ की हड्डी को सीधा रखते हए शरीर और मन को स्थिर करें। दायें हाथ की दोनों बीच की अंगुलियों से बायीं नासिका को बंद करें। अब बिना शरीर को हिलाये दायीं नासिका से जोर से श्वास लें और जोर से बाहर निकालें। पहले धीरे-धीरे करें, फिर गति को बढ़ाते हुए जल्दी-जल्दी 20 बार करें। अंत में पूरा श्वास भरकर दायें अंगूठे से दायीं नासिका को भी बंद कर लें और आंतरिक कुंभक करते हुए मूलबंध, उड्डियानबंध और जालंधर बंध लगायें। कुंभक करें। फिर धीरे-धीरे बंधों को खोलते हुए बायीं नासिका से श्वास को बाहर निकाल दें। कुछ विश्राम करें।

अब दायीं नासिका को अंगूठे से बंदकर बायीं नासिका से भस्त्रिका करें। 20 बार करने के बाद पूर्ण श्वास को भरकर बायीं नासिका को अंगुलियों से बंद करते हुए आंतरिक कुंभक करें। फिर दायीं नासिका को खोलकर श्वास को बाहर निकाल दें। श्वास को साधारण कर लें। अब दोनों हाथों को घुटनों पर रखकर दोनों नासिका छिद्रों से भस्त्रिका करें और अंत में श्वास भरकर तीनों बंध लगाते हुए आंतरिक कुंभक करें, फिर श्वास को धीरे से नासिका से निकाल दें। भस्त्रिका प्राणायाम के अभ्यास को आप धीरे-धीरे बढ़ा सकते हैं ।

यह ध्यान रहे कि श्वास छोड़ने और लेने की लय बनी रहे और श्वास लेने और छोड़ने का अनुपात एक-सा हो। पूरक व रेचक क्रियाएं समान रूप से, जोर-जोर से व जल्दी-जल्दी की जाती हैं। प्राणायाम करते हुए नाक के द्वारों पर जोर नहीं पड़ना चाहिए।

भस्त्रिका प्राणायाम में दक्षता प्रात करने के लिए पहले बहुत धीरे-धीरे, बाकी शरीर को बिना हिलाये, पेट को श्वास के साथ अंदर-बाहर करने का अभ्यास कर लेना चाहिए।

भस्त्रिका प्राणायाम के लाभ | Bhastrika Pranayama Ke Labh


बायें नथुने से भस्त्रिका करने से इड़ा नाड़ी, दायें नथुने से करने पर पिंगला नाड़ी और दोनों से करने से सुषुम्ना नाड़ी प्रभावित होती है। बायें नथुने से करने पर चंद्रांग भस्त्रिका, दायें से सूर्यांग भस्त्रिका तथा दोनों के करने पर संपूर्ण भस्त्रिका होती है।

चंद्रांग भस्त्रिका से मनुष्य को अपने विचार, इच्छा शक्ति तथा भावनाओं को शुद्ध एवं नियंत्रण करने में सहायता मिलती है।

सूर्याग भस्त्रिका से प्राण तथा पौरुष को बलवान, शद्ध एवं नियंत्रण करने में सहायता मिलती है।

संपूर्ण भस्त्रिका से केंद्रीय स्नायमंडल तथा मस्तिष्क बलवान होता है, बुद्धि एवं स्मरण शक्ति बढ़ती है। जुकाम, खांसी, दमा तथा अन्य फेफड़े के रोगों में यह बहुत लाभदायक है। फेफड़ों को शुद्धकर उन्हें शक्ति प्रदान करता है।

भस्त्रिका प्राणायाम को विधिपर्वक करने से प्राणों में स्थिरता आती है, मन वश में होता है, निद्रा तथा आलस्य दूर होते हैं तथा ध्यान लगाने में आसानी होती है।

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